लोग पलायन करते हैं, अपने गाँव छोड़ कर शहरों में बस जाते हैं ,क्यों? कुछ नया सीखने के लिए। कुछ बनने के लिए। पीछे छूट जाता है अकेला गाँव, शहरों की चकाचौन्ध से कोसों दूर अंधेरे में सिमटा भूला बिसरा गांव। लोग गांववासियों को एक हीनभावना से देखते हैं।जिन्हें कुछ नहीं आता, न पढ़ना ना ही लिखना। परंतु अब आपको अपनी ये सोच बदलनी होगी।क्योंकि कुछ ऐसे गांव भी हैं जो की कई मापदंडों में शहरों से अग्रणी हैं। यह गाँव स्वच्छता की एक मिसाल बनकर उभरा है और इससे न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व प्रेरणा ले रहा है। आईये बात करते हैं मेघालय की खूबसूरत वादियों में बसे इस छोटे से गाँव की जो कि एशिया का सबसे स्वच्छ गांव कहलाता है।

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यह गाँव मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले में बसा है। अपनी खूबसूरती के साथ साथ यह गांव अपनी स्वछता के कारण भी सैलानियों को आकर्षित करता है।यहाँ हर नागरिक स्वच्छ्ता को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझता है।यदि कोई सैलानी कोई प्लास्टिक का सामान रोड पर फेंकता भी है तो यहां के नागरिक खुद से उसे बांस की लकड़ी के बनाये कूड़ेदान मे फेंक देते हैं। यह तिकोनाकर कूड़ेदान खोह कहलाता है।

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यहाँ के ग्रामीण अपने हाथों से इन बांस के टोकरों को बनाते हैं और इनका उपयोग कूड़ेदान की तरह करते हैं।इस गांव में यह टोकरे जगह जगह देखे जा सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान 2014 और प्लास्टिक पर रोक जैसे अभियान से कई वर्ष पहले से यह गांव स्वच्छ्ता के सारे नियमो का पालन करते आया है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने रेडियो के माध्यम से इस गाँव की एक मिसाल के तौर पर प्रसंसा की थी। यह गांव आधुनिकता में अन्य हिल स्ट्सशन्स से कई आगे है।जैसे-पब्लिक टॉयलेट की सुविधा,सौर ऊर्जा युक्त बिजली के खंभे, धूम्रपान पर प्रतिबंध, प्लास्टिक पर प्रतिबंध।

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