काले रंग की चमकतीं हुई कई आकार में तराशी हुई ये पॉटरी आजकल लोगों में विशेष आकर्षण बनी हुई हैं। एक विशेष पत्थर से बनी इन पोटरीज़ को लॉंगपि पॉटरी के नाम से जाना जाता है। इन मिट्टी के बर्तनों का नाम मणिपुर के लॉंगपि नामक गाँव से पड़ा है जहां के तंगखुल नागा जाति के लोग इस तरह के बर्तनों को बनाते हैं।

यह बर्तन विशेषकर weather rock और serpentinite के मिश्रण से बनाएं

जाते हैं जो कि लॉंगपि गांव में बहुतायत में पाए जाते हैं। इन बर्तनों को potters व्हील द्वारा न बना के हाथों से ही बनाया जाता है। पहले लॉंगपि गांव के लोग 20 किमी पैदल चल कर नदी किनारे से ये पत्थर लेकर आते हैं फिर इन पत्थरों को महीन पीस कर clay  बनाई जाती है जिसे की हाथों द्वारा आकार दिया जाता है। अंत मे एक भट्टी में 900 डिग्री तापमान पर इन बर्तनों को Bake  किया जाता है। इससे यह बर्तन मजबूत बन जाते हैं।बाद में एक लोकल पत्ते pasunia pachiphylla द्वारा इन बर्तनों को रगड़ा जाता है जिससे इनमे एक खूबसूरत सी चमक आ जाती है।यहाँ के लोग इन बर्तनों को रॉयल पोटरीज़ भी कहते हैं क्योंकि इनको

ज्यादातर अमीर लोग ही खरीद पाते हैं। मणिपुर में यह बर्तन विशेष त्योहारों जैसे कि शादी ब्याह, किसी शिशु के जन्म पर और कलाकृतियों की देवी पंथोबी की पूजा हेतु प्रयोग किए जाते हैं। इन बर्तनों का इस्तेमाल विशेषकर भोजन पकाने, स्टोर करने में किया जाता है।

यह बर्तन धीमी आंच में देर तक पकाने वाले व्यंजन जैसे दाल, मीट के लिए सर्वोत्तम है। ये बर्तन पूरी तरीके से ecofriendly हैं।

मणिपुर में बने इन बर्तनों की मांग न सिर्फ भारत में है बल्कि विदेशों

में विशेषकर ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, जर्मनी,अमेरिका में ये खासे लोकप्रिय हैं।

इन बर्तनों को थांगकुल नागा जाति के स्त्री एवम पुरुष दोनों ही बनाते हैं।इनमे किसी भी केमिकल का प्रयोग नही होता। मणिपुर से आई एक विक्रेता के अनुसार इन बर्तनों को बनाने में बहुत मेहनत लगती है जिस वजह से लॉंगपा गांव की नई पीढ़ी इस विधा को नहीं जानती।आज भी वहां के बुजुर्ग ही इस काम को करते हैं। इन बर्तनों को 400 लोगों का एक गांव ही बनाता है जो कि जिला उखरुल के वासी हैं।यही उनकी रोजी रोटी है। उनकी कठोर मेहनत से बनी इन खूबसूरत एवम आकर्षक कृतियों का हमे भी प्रयोग करना चाहिए जिससे उनके आने वाली पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो जाए।

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